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    हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराओं के कारण हिन्दू धर्म में कई ऐसी अंतरविरोधी और विरोधाभाषी विचारधाराओं का समावेश हो चला है, जो स्थानीय संस्कृति और परंपरा की देन है। जिस तरह वट वृक्ष पर असंख्य लताएं, जंगली बेले चढ़ जाती है उसी तरह हिन्दू धर्म की हजारों वर्षों की परंपरा के चलते कई स्थानीय परंपराओं की लताएं भी धर्म पर चढ़ गई है। उन्हीं में से एक है बलि परंपरा या प्रथा।’मा नो गोषु मा नो अश्वेसु रीरिष:।”- ऋग्वेद 1/114/8
    अर्थ : हमारी गायों और घोड़ों को मत मार।

    विद्वान मानते हैं कि हिन्दू धर्म में लोक परंपरा की धाराएं भी जुड़ती गईं और उन्हें हिन्दू धर्म का हिस्सा माना जाने लगा। जैसे वट वर्ष से असंख्य लताएं लिपटकर अपना अस्तित्व बना लेती हैं लेकिन वे लताएं वक्ष नहीं होतीं उसी तरह वैदिक आर्य धर्म की छत्रछाया में अन्य परंपराओं ने भी जड़ फैला ली। इन्हें कभी रोकने की कोशिश नहीं की गई।

    बलि प्रथा का प्राचलन हिंदुओं के शाक्त और तांत्रिकों के संप्रदाय में ही देखने को मिलता है लेकिन इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है। शाक्त या तांत्रिक संप्रदाय अपनी शुरुआत से ऐसे नहीं थे लेकिन लोगों ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कई तरह के विश्वास को उक्त संप्रदाय में जोड़ दिया गया।..बहुत से समाजों में लड़के के जन्म होने या उसकी मान उतारने के नाम पर बलि दी जाती है तो कुछ समाज में विवाह आदि समारोह में बलि दी जाती है जोकि अनुचित मानी गई है। वेदों में धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार की बलि प्रथा कि इजाजत नहीं दी गई है।..यदि आप मांसाहारी है तो आप मांस खास सकते हैं लेकिन धर्म की आड़ में नहीं।