• raghav posted an update 4 weeks ago

    #हाइपर_नेशनलिज़्म

    अजीब से समय में जी रहें हैं हम भारतीय युवा। कभी देश,समाज़, संस्कृति के ख़िलाफ़ बोलने-लिख़ने वाले लोग बहिष्कृत किये जाते थे……और देश के प्रति बलिदानी भाव रखने वाले, राष्ट्रीयता को अपना जीवन समझने वाले, राष्ट्रगान, तिरंगा, राष्ट्रीय स्मिता की जयकार करने वाले..युवा ही क्या देश के हर वर्ग के हीरो हुआ करते थे। पर..आज.. इन सबकी बात करने वाला राष्ट्रवादी युवा लोगों में हँसी का पात्र बनता है..! जो जितना बड़ा भारतीयता का दुश्मन है वो उतना ही बड़ा बुद्धिजीवी.. सेक्युलर.. सहिष्णु कहलाता है.. और..भारतीयता का सम्मान करने वाले..देश-संस्कृति के लिए लड़ने वाले असहिष्णु, पुरातनपंथी कहे जाते हैं।

    वो प्रखर बलिदानी राष्ट्रवाद हमारी शक्ति होता था..। पर आज द्रोही विघटनकारी लोगों ने ऐसा भयानक छद्म जाल बिछाया है.. कि… सत्य असत्य बन गया है.. उचित अनुचित गड्डमगड्ड हो गए हैं।

    मुखर आतंक..छद्म आतंक ..सैनिक युद्ध.. सबसे हारकर.. दुश्मनों ने गहरी चाल खेली है। #बौद्धिक_आतंक का छद्म युद्ध ! वर्षों से हमारे दो-दो टके में बिकने वाले.. पद, पुरस्कार और सम्मान के भयंकर लालची..जाहिल बुद्धिजीवियों, प्रोफ़ेसर, इतिहासकार, कवि,लेखक,पत्रकार,फिल्मकार की एक फ़सल तैयार की गई.. एक ऐसी जहरीली फ़सल जो राष्ट्रीयता, देश भक्ति की पूरी फसल चाटने को प्रतिबद्ध है। इस बौद्धिक आतंकियों की फ़ौज ने हमारी पूरी युवा पीढ़ी को अपने भ्रामक जाल में उलझा..फंसा लिया है।

    अब राष्ट्रीयता,संस्कृति, गौरवशाली अतीत की यादें-बातें दकियानूसी बात हो गई है.. कट्टरता और अट्ठारहवीं सदी की बात हो गई है। आज के कूल-ड्यूड-ड्यूडनियाँ फटी लटकती जींस पहनकर..अंतर्वस्त्र दिखा कर..सिगरेट, शराब,ड्रग्स के संस्कार से पूरित होकर..’ग्लोबल’ हो गए हैं।

    कॉलेज में साल के 6-8 महीने हड़ताल,लड़ाई,दंगे..!! वैज्ञानिक, दार्शनिक, लेखक,समाजशास्त्री की नई फौज अब मर सी गई है.. वहाँ.. भारत तोड़ने वाले..तथाकथित रंगे-सियार से बुद्धि-शील बौद्धिक आतंकी उनके हीरो बन गए हैं। नकारात्मक इतने कि.. हर बात का बस विरोध करना है.. मानों यही तरीक़ा है बस दोगले पत्रकारों और असंयमित युवाओं का हीरो बनने का। बिना किसी उचित तर्क के विरोध करेंगे। आप राम का सम्मान करते हैं तो वो रावण की पूजा करेंगे, आप दुर्गा के उपासक हैं तो महिषासुर को हीरो बनाएंगे! भले इन मुद्दों पर उनके ज्ञान की औकात जीरो बटा सन्नाटा ही क्यों ना हो!!

    नही…ये बात टाल देने वाली हरगिज नहीं है। ये देश और संस्कृति की द्रोही सोच हम सब को ..इस महान भारतीयता को मिटा सकती है। बौद्धिक आतंकियों का बड़ा ही सॉफिस्टिकेटेड गिरोह..धीरे धीरे हमें स्वयं से दूर कर रहा है। ये सोच इतना ज़हर भर चुका है हमारे युवा पीढ़ी में कि “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम” भी अब आदर्श वाक्य नही रहे!

    दोस्तों..लड़ाई सीमा पर नहीं..नक्सली से भी नहीं!! असली लड़ाई लड़नी होगी उन छुपे भेड़ियों से..जो बुद्धिजीवी, लेखक,पत्रकार, इतिहासकार,फिल्मकार बन कर देश के बौद्धिक DNA को बिगाड़ कर..उसमें अपने ही देश, समाज़, संस्कृति के प्रति जहर बो रहे हैं। अपने अपने बुद्धि के हथियार उठाइये और टूट पड़िए ऐसे बौद्धिक आतंकियों पर।
    -संजीव आकाश